Sunday, May 25, 2014

मैं कौन हूँ !

प्रकृति ने दी मुझे गोद ऐसी ,
की सांस लेने में भी हुआ है कष्ट मुझको ,
चारों तरफ है अंधेरा - अंधेरा ,
सड़न गलन और बू है घनेरा ,
बताऊँ मैं कैसे जीवित रहा ?
दिन रात संघर्ष करता हुआ ,
उठ खड़ा सरोवर पंक में , मुस्कुराता हुआ ,
कर नमन सूर्य की पहली किरण को ,
खिलखिलाकर हंसा मैं देख भ्रमर को ,
मैं अंधेरे जीत चुका हूँ ,
जग को यह बता चुका हूँ ,
गर अस्तित्व को बनाये रखना है ,
तो सतत संघर्ष करते रहना है .
प्रगति तो तुम तभी कर सकोगे ,
जब तुम स्वयं खड़े रह सकोगे ,
नहीं तो ! पंक का साम्राज्य तो होगा ही ,
और अस्तित्व खोने का डर तो होगा ही ,
इसलिये मुझे देखो, संघर्ष कर - कर के ,
मैं पंक से निकलकर अकड़कर खड़ा हूँ ,
मुस्कुरता
 हुआ 

 हूँ .

श्रीमती उषा

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