Sunday, May 25, 2014

मैं कौन हूँ !

प्रकृति ने दी मुझे गोद ऐसी ,
की सांस लेने में भी हुआ है कष्ट मुझको ,
चारों तरफ है अंधेरा - अंधेरा ,
सड़न गलन और बू है घनेरा ,
बताऊँ मैं कैसे जीवित रहा ?
दिन रात संघर्ष करता हुआ ,
उठ खड़ा सरोवर पंक में , मुस्कुराता हुआ ,
कर नमन सूर्य की पहली किरण को ,
खिलखिलाकर हंसा मैं देख भ्रमर को ,
मैं अंधेरे जीत चुका हूँ ,
जग को यह बता चुका हूँ ,
गर अस्तित्व को बनाये रखना है ,
तो सतत संघर्ष करते रहना है .
प्रगति तो तुम तभी कर सकोगे ,
जब तुम स्वयं खड़े रह सकोगे ,
नहीं तो ! पंक का साम्राज्य तो होगा ही ,
और अस्तित्व खोने का डर तो होगा ही ,
इसलिये मुझे देखो, संघर्ष कर - कर के ,
मैं पंक से निकलकर अकड़कर खड़ा हूँ ,
मुस्कुरता
 हुआ 

 हूँ .

श्रीमती उषा

दम घुट रहा है इस संकीर्ण गृह में .

खोल दो ये वातायन मेरा तो दम घुट रहा है,
इस संकीर्ण गृह में.
ऊंच नीच की खिड़कियाँ, अमीरी गरीबी के दरवाजे ,
जाति पाति के पर्दे , लगे हुए हैं बताओ ,
निर्मल और स्वच्छ हवा का झोंका आये तो कहाँ से .
क्यों न घुटे दम इस  संकीर्ण  गृह में.


बोलने को तो बहुत बोलते हैं ,
सोचने को तो बहुत सोचते हैं,
पर नहीं करते है कर्म ऐसे.
आदर्श महापुरुषों के , विचार ज्ञानियों के ,
परमार्थ साधुओ के लेकर चले थे ,
तो बताओ आचरण में ये नीचता छल प्रपंच  आया कहाँ से .


सब जन्म से एक है , सबका जन्मदाता एक है ,
सबका पालनहार एक है , फिर ये भेद किस लिये .
स्वयं जाल बुनकर तू स्वार्थ का , अब फस गया तू निकले कहाँ से -
मेरा तो दम घुट रहा है इस संकीर्ण गृह में .


समाज का क्या हो , परिवार का क्या हो ,
चिंता हो किसलिये ,
कामनाएं अनन्त है उन्हें तो पूरी कर लूँ ,
औरों के लिये भावनाएं आये तो कहाँ से .
मेरा तो दम घुट रहा है इस संकीर्ण गृह में .

जीवन मनुष्य का जिया , आचरण जानवर का किया ,
दूसरों को दुख ही दुख दिया , छीन - छीनकर खा गया तू दूसरों की रोटियाँ .
वसुधैव कुटुंबकम का विचार आये कहाँ से .
मेरा तो दम घुट रहा है इस संकीर्ण गृह में .
---श्रीमती उषा